आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 10

आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 10

आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 10

पटना विश्वविद्यालय में दीक्षान्त समारोह के अवसर पर दिया गया अभिभाषण, 21 दिसम्बर, 1947

 

गत वर्ष आपके चांसलर ने मुझे यहाँ आकर दीक्षान्त समारोह को सम्बोधिन करने के लिए अनुरोध किया था। आपके बुद्धिजीवी कुलपति ने भी मुझसे आग्रह किया था। मैं अवश्य आता, परन्तु तबीयत खराब होने के कारण नहीं आ पाया। इस वर्ष फिर मुझसे जब अनुरोध किया गया, तो मैं कोई बहाना न कर सका। आज मैं यहाँ हूँ और मुझे आप लोगों ने अपने विचार को प्रकट करने का जो अवसर दिया है, उसके लिए आभार व्यक्त करता हूँ।

ऐसा पहली बार हुआ है कि हिन्दुस्तान के विश्वविद्यालयों के इतिहास में

अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दुस्तानी भाषा में दीक्षान्त समारोह को सम्बोधित किया जा रहा है। मैं नहीं जानता हूँ कि मेरे हिन्दुस्तानी में बोलने पर आपका क्या व्यवहार होगा? क्या आपको लगता है कि परम्परा तोड़ने के लिए मुझे माफी माँगनी चाहिए? इसमें कोई शक नहीं है कि यह पुरानी परम्परा से हट कर है। अगर कोई भी परम्परा को हटाते हैं, तो उसके लिए माफी मांगनी चाहिए। लेकिन मुझे नहीं लगता है कि आप इसके लिए कोई स्पष्टीकरण चाहते हैं। मैं जो भी कर रहा हूँ, वह नई बात है। लेकिन मुझे यह कहने की छूट है कि न यह गलत है और न ही बिना मौके की है। इसलिए माफ़ी की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं उन लोगों के सामने खड़ा हूँ, जो कि भारतीय हैं और यह एक भारतीय विश्वविद्यालय का दीक्षान्त समारोह है। इसलिए मैं भारतीय भाषा में बोलूँ तो यह स्वाभाविक है। अगर कोई माफ़ी की अवश्यकता है, तो ऐसी भाषा के प्रयोग के लिए, जो कि हमारे ऊपर ऐतिहासिक घटना की वजह से थोपी गई है। हमें अपने ही देश में अपनी भाषा से छुड़ाया गया और विदेशी भाषा को अपनाने के लिए कहा गया है। आज हम लोग खुद को इसकी वजह बताने के लिए सोचते हैं। पूरा विश्व यह जानना चाहेगा कि हमारी स्वतंत्रता के बाद हमने क्यों नहीं अभी तक कोई राष्ट्रभाषा अपनाई, कैसे ऐसी परिस्थिति आ गई कि हमारी सरकार और शिक्षा को चलाने के लिए हमारे पास कोई भारतीय भाषा नहीं है।

__ अब यह प्रश्न उठता है कि कैसे इस परिस्थिति को हटाया जा सकता है। उसका केवल एक ही उत्तर हो सकता है। हमारी शिक्षा की व्यवस्था हमारे द्वारा लागू नहीं की गई है, यह विदेशियों के द्वारा लागू की गई है। उन्होंने हमारी शिक्षा के बारे में सोचा सही था, लेकिन उनकी शिक्षा को बाँटने की शैली गलत

थी।

____यह आप लोगों को पता ही है कि जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पश्चिमी सभ्यता एवं शिक्षा लागू करने के बारे में सोचा, तब ब्रिटिश पदाधिकारी आपस में बँटे हुए थे। एक समूह चाहता था कि पुरानी शिक्षा की व्यवस्था को बढ़ावा देना चाहिए। जबकि दूसरा समूह पश्चिमी शिक्षा को लाने के पक्ष में था । अन्त में दूसरे पक्ष के अनुसार Lord Macaulay के Minute को अपनाया गया। यह Minute पश्चिमी शिक्षा को भारत में लागू करने के बारे में है, और वह सही है और कुछ भी इसके विरुद्ध बोलने को नहीं है। लेकिन पढ़ाने की यह शैली, जो उन्होंने लागू की, वह भारत के लिहाज़ से ठीक नहीं थी, न भारत के लोगों के हिसाब से सही थी। यह कोई भारतीय भाषा नहीं थी, बल्कि अंग्रेज़ी जो विदेशी भाषा थी उसे पढ़ाई का माध्यम बना दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि आधुनिक शिक्षा को गैर-भारतीय तरीके से दिया जाने लगा। जिस कारण सिर्फ उन्हें अपनी

भाषा नहीं, सोच भी बदलनी पड़ी। भारतीय अपने विचार को बनावटी तरीके से बनाने लगे, न कि प्राकृतिक तरीके से । उनका पूरा तरीका अलग-अलग पढ़ाई के विषय पर विदेशी भाषा में होने लगा। अब यह आवश्यक हो गया है कि हर भारतीय बच्चा अपने दिमाग को विकसित करे और हर तरह की पढ़ाई को प्राकृतिक तरीके से देखे। तब वह पूजनीय ज्ञान को प्राकृतिक तरीके से नहीं अपना सकता था। उसकी पूरी शक्ति, जो ज्ञान को प्राप्त करने के लिए चाहिए थी, अब बँट गई, तब उसे मजबूर किया जा रहा था कि वह ज्यादा ध्यान विदेशी भाषा को समझने में लगाए।

दूसरी क्षति यह हुई कि हमारी खुद की भाषा का उत्थान नहीं हो पाया। अगर 150 वर्ष पहले भारतीय भाषा में शिक्षा प्रदान की जाती, तो आज वह दुनिया की एक बहुत ही विकसित भाषा होती।

मान लें कि यह शिक्षा क्रांति हमारे अपने हाथों से लाई गई होती तो हमने भी दूसरे एशियाई और पूरब के देशों की तरह अपनी भाषा में वही किया होता जो उन्होंने 19वीं सदी में किया। मिस्र, सीरिया, तुर्की, ईरान, चीन एवं जापान सभी को पश्चिमी शिक्षा की आवश्यकता हुई। सभी ने आधुनिक युग के विद्यालयों और महाविद्यालयों के निर्माण किये। लेकिन किसी को भी बनावटी तरीके से अपनी भाषा छोड़, विदेशी भाषा अपनाने की आवश्यकता नहीं हुई। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि भारत की परिस्थिति दूसरे पूर्वी देशों से विपरीत थी और इस बात का फैसला करना कि किस भाषा में शिक्षा प्रदान की जायेगी, मुश्किल था। उस समय तीन मौलिक भाषा पढ़ाई जाती थी फारसी, अरबी और संस्कृत, यह सभी आधुनिक शिक्षा की भाषा बन सकती थीं, लेकिन कोई भी पूरे हिन्दुस्तान में शिक्षा प्रदान करने की भाषा नहीं बन सकती थी। संस्कृत बोलचाल की भाषा नहीं थी और कुछ ही लोग तक सीमित थी। अरबी भी उसी तरह थी, यह कुछ ही बुद्धिजीवी जानते थे। फ़ारसी सामान्य रूप में पढ़ी जाती थी और 600 वर्ष तक सरकारी भाषा थी, लेकिन यह भी भारतीय भाषा नहीं थी। कोई भी भारतीय बिना सीखे इसे नहीं बोल सकता था। इसलिए वही भाषा पढाने का माध्यम बनाया जा सकता था, जो भारत में सामान्य रूप से बोली जाती थी। लेकिन कोई भी ऐसी भाषा विकसित नहीं थी, और ना ही ऐसी थी कि उसे उच्च शिक्षा का माध्यम बनाया जा सके। उस स्थिति में सभी को अलग कर दिया गया। फारसी को सिर्फ इसलिए अलग कर दिया गया कि वह भारत की भाषा नहीं है। अतः पूरी बहस इसी पर समाप्त हो गई।

लेकिन यह ध्यान देने योग्य बात है कि जो मुश्किल भारत को हुई है, भाषा के मामले में, वही मुश्किल एशिया के दूसरे देशों को भी हुई है। मिस्र, चीन और

ईरान की अपनी भाषा है, लेकिन तुर्की और जापान का भी भाषा के मामले में भारत की तरह ही हाल था। 19वीं सदी में उनके पास साहित्य के नाम पर सिर्फ कविता थी। लेकिन उनके पास थोड़ा-सा गद्य भी था। फिर भी उन्होंने विदेशी भाषा का उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में नहीं किया। उन्होंने अपनी भाषा का प्रयोग शिक्षा के माध्यम के लिए किया, और इसका परिणाम पूरी दुनिया के सामने है। आज तुर्की और जापान में शिक्षा का माध्यम उनकी भाषा है। ज्ञान की ऐसी कोई भी शाखा नहीं है, जहाँ उनकी अपनी भाषा का विकास न हो रहा हो। अगर यहाँ भारतवासियों के हाथ में शिक्षा प्रदान की नीति बनानी होती तो यह भी यही करते, जो आज जापान और तुर्की ने किया है। आज भारत की यह स्थिति नहीं होती कि अपनी भाषा में बात करने के लिए मुझे माफी मांगनी पड़ती। लेकिन दोस्तों, हमेशा तस्वीर के दो पहल होते हैं। हमारी इस तस्वीर वाली दुनिया में मैंने जो भी कहा, वह एक ही पक्ष है।

इंसाफ़ का तकाजा है कि दूसरे पक्ष को भी जाना जाए। कितनी भी गलत ढंग से अंग्रेजी भाषा हमारे जीवन में आई हो, सत्य यह है कि 150 सालों से हमारे मस्तिष्क और शिक्षा पर इसकी छाप है। हालाँकि यह कुछ हद तक नुकसानदेह साबित हुआ है, लेकिन इसका कुछ फायदा भी हुआ है। हमें इस बात को बिना शर्त मानना चाहिए, सबसे बड़ा फायदा यह है कि बहुत सारी रुकावट अपने आप कम हो गई। हमारे इस नये देश को सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि इस भाषा ने पूरे देश को एकसूत्र में जोड़ दिया है। अलग-अलग भाग एक साथ जुट गये, जबकि सबकी भाषा और दूरी अलग है। कहा जा सकता है कि जैसे मुगलों के समय में फारसी ने एकसूत्र में देश को बाँधा था, अंग्रेजी ने भी वही कार्य किया। हमारा देश एक उप-महादेश है और हर भाग की अलग पहचान है।

लेकिन अंग्रेजी भाषा ने सारे पढ़े-लिखे भारतीयों को एकसूत्र में, कश्मीर से कन्याकुमारी तक, जोड़ने का काम किया है। यह सारे राज्य सरकार, विश्वविद्यालय, राजकीय संस्थाओं के साथ आम लोगों के बीच और, राष्ट्रीय संस्थानों को जोड़ने का कार्य करती है। इसी की वजह से इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना वर्ष 1885 में हुई थी, जिसने राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई और नया राष्ट्रीय जीवन इस देश को दिया। __ इसके अतिरिक्त भी हमें और फायदा हुआ है। अंग्रेजी की वजह से भारत ने यूरोप और अमेरिका से सीधे-सीधे ज्ञान का संबंध बना लिया। इसकी बात बाहरी दुनिया तक बिना बिचौलिये की मदद के पहुँचती है। मुझे ये कहते हुए बिल्कुल ही हिचक नहीं हो रही है कि भारत का स्थान और उसकी पहचान विश्व में अन्तरराष्ट्रीय अंग्रेजी भाषा की वजह से है। हा खैर, जो भी विचार हम अंग्रेजी के बारे में रखें, हम पायेंगे कि अंग्रेजी ने

राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र में अपना प्रभाव छोड़ा है। अब एक बुनियादी कठिनाई हमारे सामने आ गई है कि अब अंग्रेजी के प्रति हमारा क्या व्यवहार होगा? चूंकि भारत का शिक्षा मंत्रालय मुझे सौंपा गया है, आप सभी यह जानना चाहेंगे कि शिक्षा और भाषा के बारे में मेरा क्या विचार है। मैंने अपना विचार आपके सामने पूरे विस्तार से प्रस्तुत कर दिया है। लेकिन मैं इस मौके पर बहुत ज़रूरी प्रश्न के ऊपर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा।

एक चीज़ बिल्कुल साफ़ और सही है और मुझे नहीं लगता है कि कोई भी भारतीय मुझसे सहमति नहीं रखेगा। जो स्थान अंग्रेजी का हमारी शिक्षा और कार्यालय में है, वो भविष्य में नहीं रहेगा। यह जरूरी है कि हम भारतीय भाषा को उसकी असली पहचान दिलायें, लेकिन हमें काफी विकसित मस्तिष्क से इस बारे में विचार करना चाहिए। हमारे पास दो रास्ते हैं, हम जल्दी कोई कदम उठायें या फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ें और अच्छाई एवं बुराई दोनों के बारे में सोचें। मैं आपको ये बताना चाहता हूँ कि सबकुछ विचार करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि हमें दूसरा रास्ता अपनाना चाहिए, जो हमारे लिए सही है। अगर हम हड़बड़ी और जल्दबाजी में कोई कदम उठायेंगे, तो वह हमारी राष्ट्रीय एकता के लिए ज्यादा हानिकारक हो सकता है। आप इस बात से भली-भाँति अवगत होंगे कि सभी भारतीय मेरी ही तरह अंग्रेजी को हटा कर हमारी भारतीय भाषा को लाने के लिए उत्सुक होंगे। आपलोग ये भी जानते होंगे कि मैं किसी अंग्रेजी विद्यालय या विश्वविद्यालय में नहीं गया। मेरा पालन-पोषण एक पुराने पारंपरिक भारतीय परिवार में हुआ, जहाँ भारतीय ज्ञान और सभ्यता थी और यहाँ थोड़ी भी अंग्रेजी की छाप नहीं थी। मुझे जो भी शिक्षा मिली, वह फ़ारसी या अरबी में थी और वह भी पुराने तरीके से । मैंने अंग्रेजी स्वयं सीखी। मेरी इस बात से आपको पता चल गया होगा कि मेरा अंग्रेज़ी से झुकाव आपकी तरह नहीं है। मैं ये साफ़-साफ़ कह सकता हूँ कि मेरे विचार बिल्कुल निष्पक्ष हैं। मैं वो नहीं हूँ, जो किसी अंग्रेजी विश्वविद्यालय से जुड़ा हो, मैं इससे बिल्कुल ही अलग हूँ और एक अलग विचार रखता हूँ और आपकी ज़रूरतों को समझता हूँ।

मैंने पाया है कि देश के अलग-अलग भाग से ये आवाज उभर कर आ रही है कि अंग्रेज़ी को शीघ्र ही सभी सरकारी कार्यालयों से हटा दिया जाये। कुछ राज्यों में तो इसको लागू करते हुए, नये वर्ष से सरकारी गज़ट में सरकारी अधिसूचना अंग्रेज़ी में नहीं छापी जायेगी। मुझे इसमें कोई शक नहीं कि ऐसी स्थिति में सरकारी कार्यों में रुकावट आ सकती है।

यह सच एवं महत्त्वपूर्ण है कि राज्यों की भाषा को अंग्रेजी की जगह लेनी चाहिए, लेकिन जितनी भी आवश्कता और इच्छा हो, किसी घबराहट में ली गई

मदद फायदा करने की जगह हानिकारक हो सकती है। कुछ अच्छी चीज भी जल्दी में की जाये, तो हमारे रास्ते में रुकावट आ सकती है। मान लीजिए, आज यह फैसला करें कि छह माह के बाद सारे सरकारी कार्यालय से अंग्रेज़ी हटा ली जायेगी। जरा सोचिए, इस स्थिति में क्या होगा? आज अंग्रेज़ी दो राज्यों के बीच वार्तालाप का माध्यम है। केन्द्र सरकार अंग्रेजी की मदद से चलती है। कौन-सी भाषा अंग्रेजी की जगह ले सकती है? बंगाल और मद्रास को जोड़ने का माध्यम क्या है? बम्बई और असम को कौन जोड़ता है? केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों में किस भाषा में वार्तालाप होगा? आप स्वाभाविक रूप से अंग्रेज़ी नहीं कहेंगे, लेकिन मैं पूछता हूँ कि वह भाषा अब तक कहाँ थी? क्या वह अंग्रेजी का स्थान ले सकती है? बहुत ज्यादा समय लगेगा किसी भी भारतीय भाषा को इतना विकसित होने में कि वह सभी भारतीयों की विचारधारा को एक कर दे, और भारत की सरकारी भाषा के रूप में कार्य करे। अगर आप ऐसी भाषा लायेंगे, जो अभी तक उतनी विकसित नहीं हुई है, तो आप भाषा की समस्या को ठीक नहीं कर सकेंगे। दूसरी ओर, आप इस प्रश्न को और उलझा देंगे। ____ हमें यह याद रखना चाहिए कि जब अंग्रेज़ हमारे ऊपर राज कर रहे थे, यह डर था कि हम सभी अंग्रेजों के राज्य के प्रभाव में आ जायेंगे। अब जबकि हम एक स्वतंत्र देश हैं, तो वह डर पुरानी बात है, लेकिन अब यह खतरा भी है कि हम दूसरी छोर तक ना पहुँच जायें। हम उन सभी चीजों के विरुद्ध ना हो जायें जो कि अंग्रेज़ी में हों। मैं आपको इस नये खतरे से अवगत कराना चाहता हूँ कि अगर आपने खुद को न सँभाला, तो राष्ट्रीय एकता को खतरा पहुँच सकता है। ____ हमें राष्ट्रीय जीवन का अवलोकन करना है। यह तभी संभव है, जब हमारी भाषाओं को वह स्थान मिले, जिसकी वे हक़दार हैं। हमें पहले अच्छे से सोच-विचार कर कदम उठाना चाहिए और धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए। ठीक से इस प्रश्न पर विचार करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि भाषा की दो समस्याएँ हैं। एक सरकारी कार्यालय, दूसरी शिक्षा-संबंधी। सरकारी कार्यालय के लिए हमें कुछ इस प्रकार से काम करना चाहिए1. केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें ये फैसला कर लें कि सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी के साथ-साथ एक भारतीय भाषा का भी प्रयोग हो, लेकिन अंग्रेज़ी को सरकारी भाषा अगले पाँच वर्षों तक बनाये रखना चाहिए। 2. इन पाँच वर्षों में इस भारतीय भाषा को इतना विकसित कर दें कि वह स्वयं ही सरकारी भाषा का रूप ले ले। इसका प्रयोग धीरे-धीरे इस प्रकार बढ़ाना है कि छठे वर्ष स्वयं ही अंग्रेजी को हटाकर उसकी जगह ले ले। दूसरे शब्दों में अगले पाँच सालों तक दो सरकारी भाषाएँ होंगी, एक भारतीय, दूसरी अंग्रेज़ी।

अंग्रेज़ी स्वयं ही अपना स्थान खो देगी, कुछ विभागों को छोड़ कर । जहाँ तक शिक्षा का प्रश्न है, तो इस प्रकार से कार्य करना चाहिए1. हमें यह निर्णय लेना होगा कि शिक्षा का माध्यम हमेशा क्षेत्रीय भाषा हो। 2. जहाँ तक प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का प्रश्न है, तो वहाँ पर कोई परेशानी नहीं है। लेकिन उच्च शिक्षा के लिए कुछ प्रस्ताव लाने होंगे। हमें शीघ्र ही इसकी शुरुआत करनी चाहिए। यहाँ भी हमें पाँच वर्षों का लक्ष्य रखना चाहिए। इन पाँच वर्षों के अन्दर भाषा को इतना विकसित करना होगा कि छठे साल शिक्षा स्वयं ही हमारी भाषा में प्रदान होने लगे। 3. हमें भारतीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि अंग्रेज़ी के लिए कोई भी स्थान शिक्षा के क्षेत्र में नहीं छोड़ना चाहिए। अमेरिका और यूरोप की उपलब्धियों से सीधे सम्पर्क में रहने के लिए एक बड़े समूह को अंग्रेजी पर निर्भर होना पड़ेगा। आज एशिया के पूर्वी क्षेत्र में अंग्रेज़ी एक महत्त्वपूर्ण स्थान बनाये हुए है। विदेशियों से सम्पर्क करने में यह उपयोगी है। हमारा सम्पर्क चीन, जापान, इंडोनेशिया, बर्मा, लंका, मिस्र, मेसोपोटामिया, सीरिया, ईरान, तुर्की से सिर्फ अंग्रेज़ी के माध्यम से होता है। आज अंग्रेज़ी एक अन्तरराष्ट्रीय भाषा है। ये हमारी ज़रूरत है कि हम अंग्रेजी की जानकारी का पूरा उपयोग करें। इसे हम शिक्षण संस्थानों में पढ़ायें, लेकिन बिना इस बात को कहे पढ़ाया जाए कि भारतीय भाषा को अपनाने के बाद यह दूसरी उपयोगी भाषा होगी। अंग्रेज़ी (Post Graduate) का एक विशेष विषय होगी। ____ क्योंकि भाषा और शिक्षा की समस्या सभी राज्यों के लिए एक ही स्तर पर है, इसलिए सही यह होगा कि सभी राज्यों के प्रमुख एक साथ बैठ कर ये विचार करें, केन्द्र सरकार जितनी हो सके, उतनी उनकी सहायता करे। यह एक बहुत बड़ी समस्या थी। भारत सरकार द्वारा शिक्षा समारोह जुलाई, 1947 में बुलाया गया था, लेकिन राजनीतिक कठिनाइयों के कारण उसकी तिथि आगे बढ़ा दी गई, अब उसे जनवरी 1948 में रखा गया है। आशा की जाती है कि इस समस्या का समाधान निकल पायेगा।

इस विषय में एक और बात है कि जिस पर आपका ध्यान केन्द्रित करना चाहूँगा। इंसान हमेशा आखिरी छोर तक अपने विचारों एवं कर्म में चला जाता है। यह कभी-कभी ही होता है कि बीच का रास्ता अपनाना पड़ता है। वह उस घड़ी की तरह काम करता है, जिसका काँटा ना हो, या तो बहुत तेज या बहुत धीरे चलती हो। वह कभी सही समय नहीं बताता है। यह कुछ साल पहले की बात है, हमारे कुछ जवान अंग्रेजी पढ़े-लिखे लड़के अंग्रेजों की नकल उनकी भाषा, कपड़ों इत्यादि में करते थे। वह खुद की सभ्यता को भूल गये थे। कुछ को

अपने देशवासियों से उनकी भाषा में बात करने में शर्म आती थी। वह हमेशा शेक्सपियर, मिलटन, गोएथे और वर्ड्सवर्थ के विचारों को बताते थे। लेकिन उनको वाल्मीकि, कालिदास, खुसरो और अनीस के लिए कोई प्यार नहीं था। फिर एक समय ऐसा आया, जब महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय संघर्ष शुरू किया और वे नई दिशा में चले गये। अंग्रेजों की नकल करना छोड़ दिया, लेकिन अब मैंने महसूस किया, मेरे बहुत सारे देशवासियों ने एक और गलती की। पहले वे एक छोर पर थे, अब वे दूसरी छोर पर चले गये। उनके लिए भारतीय होने का मतलब था, हमें अंग्रेजी भाषा और साहित्य भूल जाना चाहिए और हमें मिलटन और शेक्सपियर के साथ कुछ नहीं करना है। मैंने कुछ क्षेत्रों से सुना है कि हमें भारतीय होने के लिए नई सभ्यता को पूरी तरह से भूल जाना चाहिए। मैं उम्मीद करता हूँ कि ऐसा विचार रखने वाला यहाँ कोई नहीं है, अगर ऐसा कोई है, तो मैं उसे याद दिलाना चाहता हूँ कि जैसा पहले वाला विचार गलत था, वैसा ये भी गलत है। बुद्ध के शब्दों में, जो दिखता है, वही सत्य नहीं है। __जिस तरह से यह सही नहीं है कि आप गुलामों की तरह पश्चिमी सभ्यता या भाषा के प्यार में अपने देश की गर्व करने योग्य सभ्यता को भल जायें। उसी तरह यह भी गलत है कि पश्चिमी सभ्यता या भाषा की छाया तक न पड़ने दें। यह मत भूलिये कि आप दुनिया की सारी दौलत को बाँध सकते हैं, लेकिन ज्ञान और सभ्यता को नहीं। इसके लिए कोई सीमा नहीं है। यह राष्ट्रीयता से ऊपर है। यह दबाव, रंग या गिरोह से आजाद है। इसका जन्म कहीं भी हुआ हो, लेकिन वह अब पूरी दुनिया का धन है। अगर इंग्लैंड चाहे भी, तो शेक्सपियर को अपने पास नहीं रख सकता है। क्या आप को लगता है कि कालिदास का ड्रामा भी भारतीय है, कालिदास की तरह? क्या आपको लगता है कि कोई भी विदेशी उसको अपना नहीं सकता है? ___मित्रो, देश की प्रगति में सबसे बड़ी रुकावट इन छोटे विचारों की है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम खुद को इस बीमारी से दूर रखें। इस नये जमाने की आजादी में जो अभी-अभी मिली है, कोई भी दूसरी बीमारी इसकी तरह खतरनाक नहीं है, जो राष्ट्रीय विकास को रोके। यह अपनी छाप सभी विचारों और कार्यों पर छोड़ती है। यह कलाकार की तरह छुपे हुये रूप में Masquerades हैं। धर्म के प्रभाव में यह अंधविश्वास है और हमें पहले की तरह लगता है। यह राजनीति हमें राष्ट्रीयता के रूप में हमारे ऊपर प्रभाव डालता है। शिक्षा और सभ्यता के क्षेत्र में हमारे राष्ट्र और देश के नाम पर प्रभाव डालता है। ज्ञान और सभ्यता के क्षेत्र में राष्ट्र और देश के नाम पर प्रभाव डालता है। हमें इन बनावटी नामों पर नहीं जाना चाहिए। हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि उन

सभी की जड़ और कुछ नहीं, तुच्छ और दकियानूसी विचार हैं। __ हमें यह दिमाग में रखना चाहिए कि 19वीं सदी में यूरोप में राष्ट्रीयता को रोग बताया गया था, जोकि संसार में उसी राष्ट्रीयता के छोटे से घेरे में था। दुनिया छोटी-सी राष्ट्रीयता के स्थान पर बहुत बड़ी राष्ट्रीयता चाहती है। इस आधुनिक दुनिया में दकियानूसी सोच की कोई जगह नहीं है। हम सही मायने में राष्ट्रीयता पर लगें, अगर हम अन्तरराष्ट्रीय सोच एवं सहनशीलता रखें तो यह मुमकिन है कि दूसरे विचारों के घेरों को बढ़ायें और सहनशीलता को अपनायें, लेकिन भारत के प्रसंग में यह कह सकते हैं कि हम पुरानी सभ्यता के ऊपर गर्व करते हैं, जो हजारों सालों से चली आ रही है। दूसरे देशों में विचारों एवं कर्म में विभिन्नता होने के कारण खून की नदियाँ बह जाती हैं, लेकिन भारत में यही जोड़ने का काम करती है। यहाँ हर तरह के विश्वास, हर तरह की सभ्यता, हर तरह की जिन्दगी के ढंग को फलने-फूलने दिया जाता है।।

इतिहास में भारत एक सम्पूर्ण और सभी तरह के विचारों को अपनाने वाला देश रहा है। इसने सभी तरह के विश्वास को अपनाया है और सभी तरह के विचारों को जगह दी है। यह सभी नई चीजों को अपनाता है। नए लोग और नई सभ्यता यहाँ आईं और इसे अपना घर बना लिया। इसकी सामाजिक जिन्दगी किसी भी धर्म के ऊपर आधारित नहीं है। वैदिक विद्यालय सभी तरह के धार्मिक विचारों के साथ चला-बढ़ा है। आज दुनिया आश्चर्य करती है भारत की इतनी सभ्यता और विचारों को देखकर, ऐसा कोई भी विचार नहीं है, जो यहाँ नहीं पाया जाता है। हम यह देखते हैं कि यहाँ सिर्फ विचारों में विभिन्नता होने के कारण किसी का झगड़ा नहीं होता है। यह एक पुरानी परम्परा है कि जो दुनिया भर के बुद्धिजीवियों ने पहचाना और माना है, यह हमारी सभ्यता को दर्शाती है। दुनिया को यह सीखना बाकी है। इस संदर्भ में श्री राधाकृष्णन जो एक प्रसिद्ध भारतीय लेखक हैं, जिन्होंने “इंडियन फिलासफी” नामक पुस्तक में ये कहा है कि “हिन्दू धर्म के विभिन्न किरदार की पारस्परिक मध्यस्थ विचार और मान्यता है, जो कि रूढ़िवादी विचारों से गुजरते हुए इस ऊँचे मुकाम तक पहुँच गयी है। शुरू से ही आर्य धर्म बढ़ने, खुद की उन्नति करने वाला और सहनशील रहा है। यह खुद को नई ताकत जो भी इसे मिली, के हिसाब से चलता रहा है। यह सिर्फ सही विनम्रता और सहानुभूतिपूर्ण समझदारी से हो सकता है। भारतीयों ने धर्म को भूल, झगड़ा कर अपने अस्तित्व को स्थापित करने से इनकार किया है। उसने कभी भी कट्टरवादी होकर अपने धर्म को सही धर्म नहीं बताया है। अगर ईश्वर इंसान के मस्तिष्क को अपने हिसाब से ढालें, वही सत्य है। कोई भी पूरे सच पर हक नहीं जमा सकता। वह सिर्फ कुछ हद तक जीत सकता है, थोड़ा-सा या

थोड़ा ज्यादा।” ___ अगर विचार और सहनशीलता की आज़ादी प्राचीन भारत काल की सबसे कीमती विरासत है, तो क्या हम इतनी विशाल विरासत के लायक वारिस नहीं साबित हुए हैं? क्या हम इस तरह की नीची सोच के कुरूप चेहरे को आज हवा में उठने दें, आज जब सारा संसार भारत को इसके प्राचीन संदेश, सहनशीलता और खुले विचार के लिए देखता है, तो हम क्यों अपना स्तर भूलकर इसे घटा रहे हैं। हमें दूसरों से सीखने की भी जरूरत है। आज भारत आज़ाद है। उसे जाँचने के लिए बाहरी दबाव की जरूरत नहीं है। वह किसी भी तरह की मानसिक सोच रख सकता है।

क्या वह दूसरों से हटकर होगा जिससे पूरी दुनिया ग्रसित है, या फिर वह सभी तरह की धारा को रखेगा, जो कि भारत की सभ्यता रही है। काफी सालों से पूरी दुनिया की आँखें हमारी तरफ तक रहीं हैं। यह हम पर निर्भर करता है कि हम अब दुनिया को आशा का संदेश देंगे या निराश करेंगे।

 

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