आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 5

आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 5

आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 5

भारत छोड़ो आंदोलन

भारत छोड़ो आंदोलन’ देश की आजादी की लड़ाई में अंतिम और निर्णायक जन आंदोलन था। इस आंदोलन में भी मौलाना आज़ाद की सक्रिय भूमिका रही। इस काल में भारत में बढ़ते असंतोष को देखते हुए गांधीजी और सरदार पटेल ने विद्रोह की संभावना पर विचार-विमर्श किया। मौलाना आज़ाद को पहले लगा कि इस तरह का अभियान अंग्रेज़ सरकार पर दबाव नहीं बना पायेगा। उन्होंने जिनाह का बढ़ता प्रभाव मुसलमानों पर देखा, जो दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेज सरकार को समर्थन देने के लिये तैयार हो गये थे। इस कठिन परिस्थिति से उबरने के लिये मौलाना आज़ाद, नेहरू, गांधी और पटेल के बीच गहन बातचीत हुई और आज़ाद आंदोलन की तैयारी में लग गए। कांग्रेस कार्यकारिणी समिति में 14 जुलाई, 1942 को यह निर्णय लिया गया कि तात्कालिक रूप से ब्रिटिश राज्य की समाप्ति आवश्यक है, न केवल भारत के लिए, बल्कि विश्व के लिये भी। अगर विश्व में स्वतंत्रता और लोकतंत्र को बनाये

खना है, तो ब्रिटिश सरकार का विरोध अनिवार्य है। एक स्वतंत्र भारत अपने संसाधनों को तब फासीवाद, नाजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध इस्तेमाल कर सकता है।

इस सिद्धांत को स्वीकार करते हुए मौलाना आजाद ने कांग्रेस कार्यकारिणी समिति से पन: गांधीजी के नेतत्व में एक अंहिसात्मक जन-आंदोलन की माँग की। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने स्थानीय और प्रांतीय स्तर के कांग्रेस नेताओं से भेंट की। अपने भाषणों से भी वे आने वाले जन-आंदोलन के लिए उन्हें तैयार कर रहे थे।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक 8 अगस्त, 1942 को बंबई में हुई, जिसमें “भारत छोड़ो आंदोलन” प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

08 अगस्त, 1942 की रात में “करो या मरो’ का मंत्र दिया गया। हम या तो भारत को स्वतंत्र करायेंगे या इस प्रयास में मारे जायेंगे। मगर हम अपनी पराधीनता को जारी रहते देखने के लिए जीवित नहीं रहेंगे।”

लोगों को यह भी आगाह किया गया कि कांग्रेस कमेटी को ही शायद समाप्त कर दिया जाए और ऐसे समय में हर भारतीय, जो स्वतंत्रता की इच्छा रखता है, इस आंदोलन का हिस्सा बने। मौलाना आजाद ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आंदोलन कांग्रेस को सत्ता में लाने के उद्देश्य से नहीं किया जा रहा है,

बल्कि लोगों के हाथ में सत्ता दिलाने और लोकतंत्र स्थापित करने के महान उद्देश्य के लिए। इसी के साथ लोगों से ‘भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ने की अपील की गई। – मौलाना आजाद और गांधीजी की आशंका सही साबित हुई। 09 अगस्त को ही आज़ाद को गिरफ्तार कर लिया गया। भारी संख्या में कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति के सदस्यों की भी गिरफ्तारी हुई। ये गिरफ्तारियाँ इसलिए की गई थीं कि नेतृत्व के अभाव में यह आंदोलन स्वतः ही समाप्त हो जाए। कांग्रेस पार्टी को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया। __गांधीजी को पूना के आगा खाँ महल में बंदी बना कर रखा गया। आजाद और कांग्रेस के कार्यकारिणी सदस्यों को अहमदनगर दुर्ग में लगभग चार वर्षों तक बंदी बना कर रखा गया। राजनीतिक बंदी होने के कारण इन्हें बाहरी दुनिया की ख़बरों से पूर्णतः अलग रखा गया।

इन गिरफ्तारियों की ख़बर ने पूरे देश को झकझोर दिया और हर जगह विरोध में एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन आरंभ हुआ। नेता-विहीन और संगठन विहीन जनता में आक्रोश तो था ही, पर यह आंदोलन बहुत संगठित नहीं था। फिर भी पूरे देश के कारखानों में, स्कूल, कॉलेजों में हड़तालें और कामबंदी हुई और कई जगहों पर हिंसक कार्यवाही भी देखी गई।

इसी आंदोलन में अरुणा आसफ अली भी शामिल हुईं और मौलाना आज़ाद ने उनकी भरपूर प्रशंसा की। राजनीतिक नेतृत्व के अभाव को देखते हुए महिला क्रांतिकारी के साथ उनका सहयोग आजाद उदारवादी चरित्र को दर्शाता है। ____ सरकार अंततः आंदोलन को कुचलने में सफल रही। इस आंदोलन का काल संक्षिप्त रहा, पर इस आंदोलन ने साबित कर दिया था कि भारतीयों के मन से डर और भय निकल चुका है और स्वतंत्रता प्राप्त करने का संकल्प मजबूत हो चुका है।

अहमदनगर जेल के पंछी

मौलाना आजाद से जुड़े कई रोचक प्रसंग हैं। ऐसा ही एक प्रसंग हमारे सामने है। मगर इसमें एक नवीनता है, जो मौलाना आजाद के व्यक्तित्व के एक वस्तुतः अन्जाम पहलू को प्रस्तुत करता है। ___ मौलाना आजाद 1942-1946 तक अहमदनगर जेल में रहे। इस जेल के कमरे वास्तव में पुराने समय में सैनिकों की बैरक रहे थे। मौलाना आजाद के साथ पंडित नेहरू और अन्य ग्यारह लोग यहाँ कैद थे। हर एक को बैरक का एक कमरा मिला हुआ था। आजाद अपने कमरे के बारे में लिखते हैं कि उसकी दीवारों और छत का प्लास्टर झड़ रहा था और लकड़ी की बल्लियाँ भी कहीं-कहीं खोखली हो गयी थीं। इनमें गौरैया के अनेक घोंसले थे। चिड़ियों के आने-जाने से इन घोंसलों से धूल और तिनके बराबर गिरते रहते थे और कमरा कूड़े-करकट से भर जाता था। ____ पहले तो आजाद ने इन पंछियों को भगाने का प्रयास किया, मगर विफल रहे। फिर उनके ही शब्दों में ” जियो और जीने दो” के विचारानुसार उन्होंने इन पंछियों से समझौता कर लिया। वे इन्हें अपने पास लाने के लिये कमरे में दरी पर चावल के दाने रखने लगे, फिर अपनी मेज पर। धीरे-धीरे ये पंछी उनसे इतना घुल-मिल गये कि कुछ उनके कंधों पर, कुछ उनके सिर पर भी आकर बैठ जाते। ऐसा इसलिये होता कि मौलाना आजाद कभी किसी विचार में गहराई तक डूबकर बिना हिले-डुले अपने सोफे या कुर्सी पर बैठे रहते और ये पंछी उनके पास आ जाते। फिर जब आजाद चौंक उठते तो ये सारे पंछी एकबार ही उड़ कर पंखे या छत की शहतीरों पर या खिड़कियों पर जाकर बैठ जाते। कभी-कभी तो ऐसा भी हुआ कि आजाद अपने विचारों में खोए पंछियों को दाना देना भूल गये। तब ये पंछी आकर उनके सिर और कंधों पर बैठकर आवाज लगाते थे। __इनमें कुछ पंछियों को वे अच्छी तरह पहचानने लगे थे। यहाँ तक कि उनका उन्होंने नाम भी रख दिया था। एक चिड़ा था, जो बड़ा निडर था। उनके छींटे हुए दानों को उसी ने पहले मुँह लगाया था, तब अन्य पंछियों ने। उनके कंधों पर आकर बैठने वाला पहला पंछी भी वही था। आजाद उसे कलंदर कहते थे। एक चिड़िया थी, जो बहुत ही सुंदर और सतर्क थी। वह दाना भी खाती, तो रह-रह कर आज़ाद की तरफ देखती रहती कि वह कहीं पकड़ी न जाए। आजाद उसे ‘मोती’ कहते थे। एक खामोश-सा चिड़ा था, गंभीर और शांत, दाना चुगने भी कभी-कभी आता था। आजाद ने उसका नाम रखा था ‘सूफी। इस

तरह, आजाद के कमरे में पंछियों का एक अपना संसार था, जिसमें अलग-अलग रूप और गुणवाले बसे हुये थे।

कैदखाने की सुबह इन पंछियों के दम से कितनी सुहानी हो जाती थी, आज़ाद की जुबानी सुनिए :

 

“ सुबह जब इस बस्ती के सारे बाशिन्दे निकलते हैं, तो बरामदे और मैदान में अजीब चहल-पहल होने लगती है। कोई फूल के गमलों पर कूदता फिरता है। कोई करोटन की शाख़ों में झूला झूलने लगता है। एक जोड़े ने नहाने का मन बना लिया और इस इंतजार में रहा कि कब फूलों के तख्तों (क्यारियों) पर पानी डाला जाता है। ज्योंही पानी डाला गया, फौरन हौज़ में उतर गया और परों को जल्दी-जल्दी खोलने और बंद करने लगा। एक दूसरे चिड़े को आस-पास पानी नहीं मिला, तो मिट्टी में ही नहाना शुरू कर दिया। पहले चोंच मार-मार कर इतनी मिट्टी खोद डाली कि सीने तक डूब सके, फिर इस गढ्ढे में बैठकर इस तरह पैर और पर मारने लगा कि धूल और गर्द का एक तूफान-सा उठ खड़ा हुआ। कुछ दूरी पर एक चिड़ा सदा की तरह किसी विरोधी से कुश्ती लड़ने में लगा था। (उद्धरणः गुबार-ए-ख़ातिर)।”

 

वहीं उनके कमरे के बाहर एक पेड़ की डाली पर एक बुलबुल रोज़ आकर बैठती थी। आजाद लिखते हैं कि उन दोनों में एक अजीब सान्निध्य बन गया था। वह उनकी “आँखों की ज़बान” को समझती थी और वे उसकी “आँखों के भावों” को पढ़ सकते थे। __इसी बीच मौलाना आजाद की पत्नी का निधन हो गया था। जब यह खबर आजाद को जेल में मिली, तो वे काफी विचलित हुए, मगर उन्होंने धैर्य बनाये रखा। जेल के प्रांगण में एक पुरानी कब्र किसी अनजाने व्यक्ति की थी। आजाद प्रतिदिन उस कब्र पर जाकर मरे हुए व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते थे। उस शाम जब वे वहाँ पर गये, तो अपनी पत्नी के लिये भी उन्होंने प्रार्थना की और एक चिराग जला दिया।

स्वतंत्रता की घड़ी

15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ। लाल किले पर पहली बार तिरंगा झंडा लहराया। अंग्रेजों का शासन समाप्त हुआ और पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में आजाद भारत की सरकार बनी। __ भारत की आजादी एक लंबे संघर्ष का परिणाम थी, जो लगभग दो शताब्दियों तक फैला था। लेकिन भारत की आजादी तब वस्तुतः सनिश्चित हो गई, जब अगस्त, 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ हुआ। मौलाना आज़ाद उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे। 1945 ई. में द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हआ। तब मौलाना आजाद और अन्य नेताओं को रिहा कर दिया गया।

भारत में आजादी के बाद नई राजनीतिक व्यवस्था के प्रारूप पर चर्चा 1942 के आंदोलन से पहले ही आरंभ हो गई थी, जब ब्रिटिश सरकार के एक मंत्री सर स्टैफ़र्ड क्रिप्स ने भारत की यात्रा की थी और कुछ प्रस्ताव रखे थे। वह प्रयास विफल रहा था। 1946 में पुनः नये प्रयास आरंभ हुए। ____ उसी वर्ष एक तीन सदस्यीय दल देश के प्रमुख नेताओं से वार्ता के लिए भारत आया। ये सभी ब्रिटिश सरकार के मंत्री थे-स्टैफ़र्ड क्रिप्स, पी.वी. अलेक्जेन्डर और पेथिक लारेंस। उनके प्रस्ताव कैबिनेट मिशन प्लान’ के नाम से जाने जाते हैं। ___हमारा देश तब एक बड़ी चुनौती से जूझ रहा था। मुस्लिग लीग की माँग थी कि स्वतंत्र भारत में मुस्लिम बहुसंख्या वाले क्षेत्र अलग राज्य (पाकिस्तान)

बनें। तब देश को तीन स्वायत्त भागों में बाँटने के विचार पर विमर्श हो रहा था। कैबिनेट मिशन का प्रस्ताव था कि पश्चिमोत्तर और पूर्वी भारत में मुस्लिम बाहुल्य प्रांतों के दो अलग-अलग क्षेत्र बनाए जाएं। शेष ब्रिटिश शासित भारत को एक तीसरी इकाई माना जाय । इन तीनों का एक संघ बनाने का प्रस्ताव दिया गया। भारतीय राजाओं के अधीन जो छोटे-बड़े राज्य थे, वे इस संघ से अलग थे। उनके शासक संघ में शामिल होने या न होने के लिये मुक्त थे। संघीय सरकार को सीमित अधिकार दिये गये थे और प्रांतों को बहुत अधिक स्वायत्तता प्राप्त थी। ___ मौलाना आजाद ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, क्योंकि उस समय भारत की एकता बनाये रखने की वही एकमात्र संभावना थी। उन प्रस्तावों पर अंतिम सहमति बनाने के लिये सभी राजनीतिक दलों की बैठक शिमला में बुलाई गई। __1946 में शिमला कॉन्फ्रेंस से पहले आजाद ने स्वेच्छा से कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ दिया था। शिमला कॉन्फ्रेंस कुछ मतभेदों के कारण असफल हो गयाऔर मुस्लिम लीग ने अंततः मुसलमानों के लिए एक पृथक देश पाकिस्तान की माँग रख दी।

विभाजन के प्रस्ताव को कांग्रेस ने पहले तो अस्वीकार कर दिया, मगर देश की बिगड़ती हुई स्थिति और सांप्रदायिक हिंसा के कारण इस पर विचार करना अनिवार्य हो गया। मुहम्मद अली जिनाह, जो मुस्लिम लीग में सर्वेसर्वा थे, पाकिस्तान की माँग पर अडिग थे। अंततः सरदार पटेल और पंडित नेहरू ने विभाजन को स्वीकार कर लिया। गांधीजी ने भी विवशता में यह कड़वा धूंट पी लिया। आजाद इसके विरोधी रहे । मगर उनका विरोध होनी को बदल नहीं सका। _ अंतत: 14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान और 15 अगस्त, 1947 को भारत दो अलग-अलग देश बन गए।

विभाजन का दर्द

भारत को आजादी बड़े जतन के बाद मिली। मगर इसकी बड़ी भारी कीमत देशवासियों को चुकानी पड़ी। देश दो भागों में बँट गयाः भारत और पाकिस्तान। इसके साथ जितनी अधिक हिंसा और विनाश की स्थिति बनी, उसने सभी राष्ट्रवासियों को स्तब्ध कर दिया। उस समय की स्थिति को एक इतिहासकार ने इस तरह लिखा है :

 “भारत की एकता का सपना चूर-चूर हो चुका था और भाई-भाई से बिछड़ चुका था। इससे भी बुरी बात यह थी कि स्वतंत्रता के क्षण में भी अवर्णनीय बर्बरता के साथ सांप्रदायिकता का दानव भारत और पाकिस्तान दोनों में लाखों लोगों की बलि ले रहा था। अपने पूर्वजों की धरती से नाता तोड़कर लाखों-लाख शरणार्थी इन दो नये राज्यों में पहुँच रहे थे।”

गांधीजी इस हिंसा से बेहद दुखी थे। हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रयास विफल हो चुका था। अहिंसा का आदर्श निरर्थक सिद्ध हो चुका था। आज़ादी के कुछ ही दिनों बाद 02 अक्टूबर, 1947 को अपने जन्मदिन के अवसर पर उन्होंने एक पत्रकार से कहा था कि वे “ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि वे उन्हें आँसुओं की इस घाटी से उठा ले और उन्हें इस हत्याकाण्ड का असहाय दर्शक न बना रहने दे, जो बर्बर बन चुका मनुष्य कर रहा है। ____आज़ाद भी आहत थे। उन्होंने कहा थाः “सच पूछो, तो अब मैं शिथिल हो गया हूँ। एक ऐसी दूर की आवाज़ जिसने अपने देश में भी परदेसी-सा जीवन बिताया है।”

पाकिस्तान जाने का निर्णय लेने वाले मुसलमानों से उन्होंने पूछा थाः “आखिर तुम कहाँ जा रहे हो और क्यों जा रहे हो? यह पलायन का जीवन जो तुमने हिजरत के पवित्र नाम पर अपनाया है, इस पर विचार करो, तुम्हें प्रतीत होगा कि यह गलत है। भारत में रहने का निर्णय लेने वाले मसलमानों के लिये उनका संदेश था. “आज हम क्रांति का एक काल परा कर चके हैं। हमारे देश के इतिहास में अभी भी कुछ पन्ने खाली हैं और हम इन पन्नों का शीर्षक बन सकते हैं, परंतु शर्त यह है कि हम इसके लिये तैयार भी हों। आओ, कसम खाओ कि यह देश हमारा है। हम इसी के लिये हैं और इसके भाग्य के निर्णय हमारी आवाज़ के बिना अधूरे रहेंगे।” ____

मौलाना आजाद का दर्द, उनकी व्यथा, हम तभी समझ सकते हैं, जब हम याद रखें कि उन्होंने सारा जीवन भारत की अखंडता और हिन्द-मस्लिम एकता को बनाये रखने में बिताया। अंग्रेजों की फूट डालने की नीति और भारत के कुछ दलों की साम्प्रदायिक राजनीति के वे सदा विरोधी रहे | 1909 में जब मुसलमानों के लिये पृथक मतदान का प्रबंध किया गया था, तो आजाद ने इसका विरोध किया था। दो राष्ट्र के सिद्धांत का उन्होंने हमेशा खंडन किया। उनका पूर्ण विश्वास था कि हिन्दू और मुसलमान एक ही राष्ट्र हैं| 1946 में कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कैबिनेट मिशन योजना का समर्थन किया था, क्योंकि इससे भारत का विभाजन रोका जा सकता था। __

दुर्भाग्यवश शिमला कांफ्रेंस में मतभेदों के कारण यह प्रयास विफल रहा। तब तक आज़ाद कांग्रेस के अध्यक्ष का पद त्याग चुके थे। इसके बाद लार्ड वैवेल की जगह लार्ड माउन्टबेटन भारत का वायसराय नियुक्त हुआ था। सांप्रदायिक द्वेष, पारस्परिक अविश्वास और भारत के अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेटेन की विभाजन योजना के नतीजे में देश का विभाजन हुए बिना स्वतंत्रता की प्राप्ति असंभव प्रतीत हो रही थी।

मौलाना आजाद इसके विरोधी रहे। मगर एक अनुशासनबद्ध राजनीतिक कार्यकर्त्ता के रूप में उन्होंने अपनी भावना के विपरीत इस निर्णय को मान लिया. फिर भी उन्होंने यह बात हमेशा कही,

” संयुक्त भारत का बँटवारा मूल रूप से गलत था। धार्मिक विरोधों को जिस प्रकार हवा दी गई, उसके निश्चित परिणाम यही थे, जो हमने अपनी आँखों से देखे और कुछ स्थानों पर तो दुर्भाग्यवश आज भी देख रहे हैं।”

धर्म-निरपेक्षता

मौलाना आजाद एक मुस्लिम धर्माचार्य थे और इस्लाम के प्रकांड विद्वान । इसके साथ वे धर्म निरपेक्षता में पूर्ण विश्वास रखते थे और इसका सदैव समर्थन करते रहे। ___मौलाना आजाद की धर्म-निरपेक्षता के दो आधार थे : उदारता और निष्पक्षता। उनके धार्मिक विचार अत्यंत उदार थे। इस्लाम के साथ उन्होंने भारत के सभी प्रचलित धर्मों के सिद्धांतों को अपना आदर्श माना। वेदों, महाकाव्यों, सूत्रों के साथ महात्मा बुद्ध और महावीर जैन के उपदेशों से वे परिचित थे। इसाई धर्म के सिद्धांतों को उन्होंने समझा था। भक्त संतों और सूफियों के विचारों का उन पर प्रभाव था। मध्यकाल के सुप्रसिद्ध अरब दार्शनिकों का चिंतन उनके सामने था। इन सब में निहित मानवीय पहलुओं को उन्होंने अपने आचरण, अपनी लेखनी और अपने संवाद में महत्व दिया। 18वीं और 19वीं शताब्दी में हुए विज्ञान के विकास से वे प्रभावित थे और इसमें निहित विकास की संभावनाओं से भलीभाँति परिचित थे। अपने समकालीनों में वे गांधीजी और जवाहर लाल नेहरू के विचारों से प्रभावित थे। उन्होंने गांधीजी से सभी धर्मों के प्रति सम्मान की भावना को समझा था और नेहरू से राजनीति और धर्म को पृथक रखने का व्यावहारिक गुण अपनाया था। ___ इन विचारों को उन्होंने अपने अनेक लेखों में प्रचारित किया। लेकिन इस संदर्भ में उनका वह अध्यक्षीय भाषण एक मील का पत्थर है, जो उन्होंने 1940 में रामगढ़ में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में दिया था। उन्होंने बड़े तार्किक ढंग से स्पष्ट किया था कि किसी व्यक्ति के धार्मिक विश्वासों का कोई टकराव उसके राजनीतिक विचारों से नहीं होता है।

उन्होंने धर्म को कभी पृथक पहचान का आधार नहीं माना। उनकी नज़र में सभी भारतवासी एक थे, चाहे वे किसी धर्म के मानने वाले हों। वे धर्म को तोड़ने वाली नहीं, बल्कि जोड़ने वाली शक्ति मानते थे। ___ इस्लाम के गहन अध्ययन ने उनके सामने स्पष्ट कर दिया था कि इस्लाम का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत देश-प्रेम था। राष्ट्रीय आंदोलन के संघर्षपूर्ण चरण में, देश के विभाजन की विपत्ति में और स्वतंत्र भारत के नव-निर्माण में, उनका धर्म-निरपेक्ष आचरण देश के प्रति उनकी महान और सकारात्मक देन है।

साझी संस्कृति

भारतीय संस्कृति की प्राचीनता और समृद्धि से मौलाना आजाद भली-भाँति परिचित थे। इसकी समन्वय-शक्ति को भी वे मानते थे। इस सांस्कृतिक परंपरा में आर्य, अनार्य, अरब और मध्य एशियाई प्रभाव निर्णायक थे। पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव भी इसमें शामिल थे। आजाद इस संस्कृति को शिथिल नहीं, बल्कि गतिशील और विकासोन्मुखी मानते थे। उनका अडिग विश्वास था कि इस साझी विरासत या गंगा-यमुनी तहजीब के विकास की धारा को हम न रोक सकते हैं, न वापस पलट सकते हैं।

1940 में रामगढ़ में अपने प्रसिद्ध भाषण में उन्होंने कहा थाः

“हमारी एक हजार साल की मिली-जुली जिंदगी ने एकीकृत राष्ट्रीयता का साँचा ढाल दिया है। ऐसे साँचे बनाए नहीं जा सकते बल्कि वे प्रकति के अनदेखे हाथों से सदियों में स्वतः बन जाते हैं। हम पसंद करें या न करें, मगर अब हम एक हिन्दुस्तानी राष्ट्र, और एक अविभाज्य हिन्दुस्तानी राष्ट्र, बन चुके हैं। पृथकता की कोई बनावटी कल्पना हमारे इस एक होने को दो नहीं बना सकती।”

___ उन्होंने यह भी बताया कि शताब्दियों से समान इतिहास में हमने आपने एकजुट प्रयासों से भारत को समृद्ध बनाया है। हमारी भाषा, हमारी कविता, हमारा साहित्य, हमारी कला, हमारी वेश-भूषा, हमारे रीति-रिवाज और हमारे दैनिक जीवन की अनेक घटनाओं पर हमारे साझा प्रयासों की छाप पड़ी है। ___ उन्होंने आगे यह भी कहा कि कुल ग्यारह शताब्दियाँ बीत गाई हैं, जब इस्लाम का भारत में आगमन हुआ। इसलिए इस्लाम का भी भारतीय संस्कृति में अब उतना ही अधिकार है, जितना हिन्दू धर्म का । अगर हिन्दू धर्म भारत में हजारों वर्षों से बना हुआ है, तो इस्लाम धर्म भी भारत में एक हजार वर्षों से बना

हुआ है।

इस प्रकार, उन्होंने सह-अस्तित्व और साझी संस्कृति को राष्ट्रीय एकता का आधार माना और इस साम्प्रदायिक दुराग्रह का खण्डन किया कि भारत में हिन्दू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं।

मौलाना आजाद का विश्वास था कि तर्क और इतिहास की कसौटी पर परखे हुए इस सत्य को मानकर ही भारतवासी प्रगति-पथ पर आगे बढ़ सकते हैं और भविष्य के लिये अपनी सफलता की कल्पना कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि संसार की निगाहें हम पर हैं। अब हमें इस आशा पर खरा उतरना है। हम चाहें, तो भारत में सहिष्णुता, समन्वय और विविधता में एकता का उदाहरण सारी दुनिया के लिये अनुकरणीय बन सकता है।

वे यह भी मानते थे कि देश के अंदर भी देश के बाहर भी शांति बनाये रखने में संस्कति का योगदान निर्णायक है। देश में साम्प्रदायिक द्वेष को कम करने के लिये साझी संस्कृति के प्रति जानकारी जरूरी थी। इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सांस्कृतिक आदान-प्रदान से युद्ध की संभावनाओं को खत्म किया जा सकता है।

इसी विश्वास के आधार पर मौलाना आजाद ने अनेक संस्थाएँ बनाई जिनके माध्यम से शिक्षा, साहित्य और कला के क्षेत्रों में इस साझी संस्कृति को व्यावहारिक समर्थन मिला। इनमें साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी प्रमुख हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसी सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की स्थापना की।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *