आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 8

आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 8

आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 8

अपरिग्रही का सरल जीवन

मौलाना आज़ाद का निजी जीवन बहुत सरल था। उन्होंने धन और वैभव को कभी महत्वपूर्ण नहीं माना। उनके पिता धर्माचार्य थे और उनके अनुयायियों की संख्या बहुत बड़ी थी। उनके जीवन में धन और आराम की कमी नहीं थी। आज़ाद चाहते, तो उसी परंपरा को अपना लेते, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। ___ मौलाना आजाद ने एक धर्माचार्य के दायित्वों को नया रूप दिया। उनके विचारों में तर्क और आधुनिकता की प्रधानता थी। उनकी आलोचना भी हुई, मगर वे अपने विचारों से नहीं भटके। ____ मौलाना आजाद के जीवन में नैतिक मूल्यों का बड़ा महत्व था। इसकी प्रेरणा उन्हें बचपन में ही अपने परिवार से मिली थी। उनके पिता की किताबों को लिखने का काम एक व्यक्ति करते थे। उनका रहन-सहन मामूली था। कपड़े गंदे और फटे होते थे। जब आजाद ने इस बात को अपनी माता से कहा, तो उन्हें जवाब मिला कि किसी की सूरत को देखकर उसके गुण को नहीं समझा जा सकता। क्या पता, ईश्वर की नज़र में वह तुमसे ज़्यादा प्यारा हो- आदमी की इज्जत का यह पाठ आजाद कभी नहीं भुला पाए।

कलकत्ता स्थित अपने घर में वे एक साधारण व्यक्ति की तरह रहे। यह मकान बालीगंज, सर्कुलर रोड पर स्थित था। अब वहाँ मौलाना आजाद म्यूजियम है। इसमें आज़ाद के निजी उपयोग की कुछ वस्तुएँ, उनके चित्र और उनका भारत रत्न सम्मान सुरक्षित है। कभी-कभी तो आर्थिक कठिनाइयों के

समय वे अपने घर के कुछ कमरे किराया पर भी देते थे। मंत्री हो जाने के बाद भी उनकी सादगी बनी रही। दिल्ली में उनका कोई अपना मकान नहीं रहा। 4, किंग जॉर्ज एवेन्यू पर उनका सरकारी आवास था। अब उसी को विस्तार देकर माननीय उप राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास बनाया गया है। यह सड़क भी अब मौलाना आजाद रोड कहलाती है। मरने के समय उनके पास केवल 4000/- रु० थे, जो उनकी अनेक किताबों की Royalty (स्वलाभ) से प्राप्त

हुए थे।

___ मौलाना आज़ाद बड़े शांत स्वभाव के थे। किसी परिस्थिति में भी वे विचलित नहीं होते थे। उनके विरोधियों ने उनकी आलोचना की, उन पर व्यंग्य किया, उनके साथ अभद्र व्यवहार किया। लेकिन उनका धैर्य बना रहा। उन्होंने सदैव उस मर्यादा का पालन किया, जो एक सभ्य और शरीफ़ व्यक्ति की पहचान होती है। __ मौलाना आज़ाद को संगीत में, विशेषकर सितार-वादन में रुचि थी। उन्होंने सितार बजाने की शिक्षा भी प्राप्त की थी। अपने इस अनुभव को लिखते हुए वे पुरानी बात याद करते हैं कि जब वे (1908 में) इराक गए थे, तो उनके लिए मुहम्मद कुरदी ने दजला नदी में नौका की सैर का आयोजन किया था। इसमें संगीतज्ञ और कवि भी साथ थे। ___ आज़ाद सितार-वादन में दक्ष थे। आगरा में पूर्णमासी की एक रात ताजमहल के प्रांगण में सितार बजाने के आनंद को उन्होंने कुछ इस तरह लिखा

“रात का सन्नाटा, तारों की छाँव, ढलती हुई चाँदनी और अप्रील की भीगी हुई रात, चारों तरफ ताज की मीनारें सर उठाये खड़ी थीं। बीच में चांदनी से धुला हुआ गुंबद शिथिल-सा था। नीचे यमुना की रुपहली लहरें बल खाकर दौड़ रही थीं और ऊपर सितारों की अनगिनत निगाहें हैरत के आलम में तक रही थीं। अंधकार और प्रकाश की इस मिली-जुली फ़िज़ा (वातावरण) में सितार के तारों से संगीत के सुर उठते और हवा की लहरों पर बेरोक तैरने लगते।”

चित्रों के, विशेषकर मुगलशैली के चित्रों के, वे सुधी पारखी थे। उन्हें चाय भी बहुत पसंद थी। वे हर सुबह तीन या चार प्याली चाय पीते, फिर सुबह के नाश्ते के बाद और फिर शाम में भी कई बार। मगर उनकी चाय विशेष थी। वे

Green Tea या Chinese Tea पीते थे, जो Jasmine Tea के नाम से तब बाज़ार में मिलती थी। उसमें वे दूध और चीनी नहीं मिलाते थे। इस चाय की प्रशंसा उन्होंने अपने एक पत्र में की है, जो बाद में “गुबार-ए- खातिर” में छपा।

 

एक अवसर पर जब उन्हें यह चाय नहीं मिल रही थी तो उन्होंने लिखा, “अफसोस, वह चाय, जो मेरे विचलित मन को शांत करती थी और जिससे मेरे चेहरे पर सुकून दिखता था, अब मेरी पहुँच से बाहर है। मुझे उसी चाय की आदत है, मगर वह विशेष चाय (Jasmine Tea) मेरे पास बस थोड़ी थी, जो अब समाप्त हो चुकी है, अहमदनगर और पूना में कोई इस अनमोल चीज का नाम तक नहीं जानता। मैं अब सामान्य काली पत्ती की चाय पीने पर मजबूर हूँ, जो खौलाकर दूध और चीनी मिलाकर एक शरबत की तरह बनायी जाती है।”

मौलाना आज़ाद प्रकृति-प्रेमी भी थे। जब वे अहमदनगर के किले में कैद थे, तो उनके कमरे के बाहर दो पक्षियों ने घोंसला बना लिया था। उन पक्षियों की चहकती हुई बोली, उनकी सुबह को और भी मनोरम बना देती थी। इसके साथ कमरे में रहने वाली गौरैया, खिड़की के बाहर पेड़ों की डाली पर बैठने वाली बुलबुल, खुले मैदान में कौवों के झुण्ड और उनकी कर्कश वाणी के बीच नीम के पेड़ पर खेलती गिलहरियों का मनोहर वर्णन उनके प्राकृति-प्रेम को दर्शाता है। उन पक्षियों के प्रति अपने मनोभाव को उन्होंने “गुबार-ए-खातिर” में लिखा है। इस रचना में उनके वे सभी पत्र शामिल हैं, जो उन्होंने अहमदनगर किले में अपनी कैद की अवधि में लिखे थे। लेकिन कैद के कारण उनका एक भी पत्र डाक में नहीं जा सका। इसकी अनुमति नहीं थी। बाद में, ये सभी पत्र संकलित रूप में इस पुस्तक में प्रकाशित हुए। __आज़ाद गंभीर व्यक्ति थे, मगर कभी-कभी उनके वाक्यों में सटीक हास्य की झलक भी मिलती है। जब द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ा और ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों से सहयोग माँगा, तो गांधीजी ने वायसराय लार्ड लिनलिथगो से कहा कि वे आक्रमणकारी सेनाओं का सामना अहिंसा से करेंगे। वायसराय इस उत्तर पर ऐसे स्तब्ध रह गए कि गांधीजी को विदा करने बाहर तक नहीं आए। गांधीजी ने जब मौलाना आज़ाद को बताया कि वायसराय सामान्य शिष्टाचार भी भूल गये तो आजाद ने कहा कि उन्होंने ऐसे जवाब की अपेक्षा सपने में भी नहीं की होगी, गांधीजी इस बात पर दिल खोलकर हँसे ।

मौलाना आजाद की मृत्यु 22 फरवरी, 1958 को हुई। दिल्ली में जामा मस्जिद के पास उनकी कब्र भी उनकी सादा ज़िन्दगी की एक यादगार है। एक छोटे चबूतरे पर संगमरमर की जाली से घिरी, मेहराब-रूपी छतरी के नीचे यह कब्र देश-प्रेमियों और विद्यानुरागियों के लिए एक तीर्थ, एक प्रेरणा-स्थल के समान है। उनके नाम को समर्पित कई शैक्षणिक संस्थाएँ देश में आज महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं : कोलकाता स्थित Maulana Abul KalamInstitute of Asian Studies, Maulana Azad College, Maulana Abul Kalam Institute of Technology; हैदराबाद स्थित Maulana Azad National Urdu University; 1914 Red Maulana Azad National Institute of Technology आदि। उनकी जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में भारत सरकार ने 1989 में Maulana Azad Education Fund की भी स्थापना की थी, जो शिक्षा के प्रसार में आज भी सक्रिय है।

भारत के प्रति आजाद के बहुआयामी योगदान की स्वीकृति में उन्हें 1992 में भारतरत्न (मृत्योपरांत) से सम्मानित किया गया।

जीवन मूल्य और संदेश

 

मौलाना आज़ाद के जीवन में नैतिक मूल्यों का महत्त्व सबसे अधिक था। इनमें कुछ का संबंध इस्लाम धर्म से था, कुछ भारतीय दर्शन से प्रभावित थे, कुछ की प्रेरणा गांधीजी से प्राप्त हुई और कुछ उनके अपने आदर्शों पर आधारित थे।

इन जीवन मूल्यों की समीक्षा हम इस प्रकार कर सकते हैं:

1. सामाजिक संबंधों में मानवीयता

2. राजनीति में धर्म-निरपेक्षता

3. धर्म का सार : सहिष्णुता और समन्वय

4. बौद्धिक क्रिया-कलापों का ध्येय : आध्यात्मिक उत्थान

5. आम जन की सेवा के प्रति पूर्ण समर्पण

6. सार्वजनिक जीवन में अप्रश्नीय ईमानदारी

आजाद ने इन्हीं सिद्धांतों के अनुरूप अपना जीवन बिताया।

1. आधुनिक पाश्चात्य दर्शन में मानववाद को विशेष महत्व दिया गया है। इसका उद्देश्य था कि मानव के बौद्धिक विकास और भौतिक सुख को सुनिश्चित किया जा सके। मौलाना आजाद और उनके समकालीनों पर भी इसका प्रभाव था। मौलाना आजाद ने इस विचार को सामाजिक जीवन के परिप्रेक्ष्य में भी देखने का प्रयास किया। समाज के प्रति मनुष्य के दायित्व की उन्होंने इन्हीं संदर्भो में व्याख्या की। उनका विचार था कि हमारे सामाजिक संबंधों में ऐसा वातावरण बने, जिसमें समाज के सभी सदस्यों को बौद्धिक विकास और भौतिक सुख की प्राप्ति के अवसर मिलें।

2. धर्म-निरपेक्षता का सिद्धांत भी आधुनिक पाश्चात्य दर्शन का महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका आशय था कि धर्म केवल व्यक्ति के निजी जीवन तक सीमित रहे, इसकी भूमिका सार्वजनिक जीवन में नहीं होनी चाहिए। मौलाना आजाद का मानना था कि धर्म मानव जीवन का अभिन्न अंग है। इसे राजनीति से दूर रखना उनकी नज़र में उचित था, क्योंकि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने की जो सांप्रदायिकता की नीति थी, वह धर्म पर ही आधारित थी। अतः राजनीति को इससे मुक्त रखना ही देश के हित में है। परंतु व्यक्ति के नैतिक उत्थान के लिए और सामाजिक दायित्वों के निर्वाह के लिये धर्म के महत्व और अनिवार्यता को वे मानते थे।

3. भारत की प्राचीन गौरवशाली परंपरा में धर्म का जो रूप मान्य रहा था, मौलाना आज़ाद उसके प्रबल समर्थक थे। धार्मिक जीवन में भारतीय परंपरा “सर्व धर्म सम्भाव” अर्थात् सभी धर्मों के एक समान महत्व और सम्मान के वे समर्थक थे। भारतीय संस्कृति में विविधता में एकता के आदर्श को भी वे मानते थे, सहिष्णुता एवं समन्वय के मूलमंत्र का वे उसी प्रकार सम्मान करते थे, जैसे महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानन्द।

4. मौलाना आजाद के जीवन में शिक्षा का केन्द्रीय महत्व था और वह आध्यात्मिक उत्थान को इसका प्रधान लक्ष्य मानते थे। अध्यात्म के प्रति उनका लगाव और उनकी निष्ठा भारतीय परंपरा और इस्लामी आदर्शों में उनकी आस्था का परिणाम था। निजी जीवन में अध्यात्म ही व्यक्ति के उत्थान और चरित्र-निर्माण का आधार बन सकता है, इस तथ्य को वे भली-भाँति समझते थे। वे शिक्षा को केवल पाठ्य-पुस्तकों के अध्ययन तक ही सीमित नहीं मानते थे। उनकी नज़र में शिक्षा एक वृहत बौद्धिक क्रिया-कलाप का अभिन्न अंग थी, जो व्यक्ति में इन सभी गुणों को निखार सकती है, जो मनुष्य में अंतर्निहित हैं।

5. आम जन की सेवा के प्रति पूर्ण समर्पण उन सभी महान राष्ट्रनेताओं का ध्येय था, जो देश की आजादी और देशवासियों के उद्धार का सतत् प्रयास कर रहे थे, मौलाना आज़ाद भी इस पंक्ति में शामिल थे। एक अजीब बात यह थी कि वे आम लोगों के साथ बहुत घुल-मिल कर नहीं रहते थे। उनका एक अपना वैचारिक और मानसिक धरातल था। उनसे मिलने-जुलने वाले लोग वही थे, जो उस मानसिक धरातल तक पहुँच सकते थे। अपने लेखों में वे आम जन की भाषा का नहीं, बल्कि विद्वत जनों की भाषा का उपयोग करते थे। मगर इनके माध्यम से वे हमेशा देश और अवाम के प्रति पूर्ण समर्पण का अत्यंत प्रभावशाली संदेश देते थे। उनका मानना था कि समाज में रचनात्मक परिवर्तन बुद्धिजीवियों के माध्यम से लाया जा सकता है और इसके लिए आम जन की सेवा और उनके प्रति समर्पण की भावना जगाना अनिवार्य है। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी वाणी और लेखनी ने मुस्लिम धर्माचार्यों और बुद्धिजीवियों के मन में एक नया उत्साह जगाया और उन्हें राष्ट्र और जन की सेवा के लिये उत्प्रेरित किया।

6. मौलाना आज़ाद उस पीढ़ी के राजनेताओं में थे, जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के आचरण की अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत की है। उनके आचरण, उनके चरित्र, उनके सार्वजनिक जीवन पर कभी प्रश्न नहीं उठाये गये, न उनके जीवन में और न उनकी मृत्यु के बाद । आज हम सार्वजनिक जीवन में जिस पारदर्शिता की बात करते हैं, वह आजाद और उनके समकालीनों का स्वाभाविक गुण था। उन्होंने कथन में भी और कर्म में भी वह ईमानदारी बनाये रखी, जिसकी प्रासंगिकता हर समय में और हर समाज में बनी रहेगी। भारत की स्वतंत्रता के बाद उन्होंने देश के नव-निर्माण का संदेश अपने इस पत्र के माध्यम से दिया :

लिपि-अंतरण

स्वतंत्रता हमने प्राप्त कर ली है, लेकिन स्वतंत्रता के सदुपयोग का काम अभी शेष है। हमारा दायित्व है कि अपनी सारी शक्तियाँ इस दूसरे काम के प्रति अर्पित कर दें। शांति. एकता, पारस्परिक विश्वास और देश-प्रेम के बिना यह अभियान सफल नहीं हो सकता।

मौलाना आज़ाद का यह संदेश न केवल उनके जीवन में, बल्कि आज भी, जबकि देश की स्वतंत्रता के बाद कई दशक बीत गए हैं, हमें याद रखने और इसके अनुसार आचरण करने की प्रेरणा देता है। इसी से हमारी सफलता संभव है।

जीवन-यात्रा के मुख्य पड़ाव

1 1888 मक्का नगर में जन्म हुआ। 

1897 परिवार के साथ स्वदेश लौटे और कलकत्ता में बस गए। 

1898 कविता लिखना शुरू किया। 1 1899 माता का निधन हुआ। 

1900 जुलैखा (बेगम) के साथ विवाह हुआ। 

1902 औपचारिक शिक्षा पूरी हुई। 

1903 लिसान उस्-सिद्क पत्रिका का प्रकाशन। 

1906 बड़े भाई गुलाम यासीन का निधन। 

1908 पहली विदेश-यात्रा। 

1912 “अल-हिलाल” समाचार-पत्र का प्रकाशन। 

1914 सरकार द्वारा “अल-हिलाल” पर प्रतिबंध लगाया गया। 

1915 “अल-बिलाग” समाचार-पत्र का प्रकाशन। 

1916 ____ “अल-बिलाग” का प्रकाशन बंद करना पड़ा। 

1916 सरकार ने बंगाल प्रांत से निष्कासित कर दिया। 

1916-20 राँची में निवास की अवधि, ‘तर्जुमानुल कुरआन’ की रचना, प्रथम नजरबंदी एवं कैद। 

1920 खिलाफत आंदोलन का प्रारंभ। 

1921 असहयोग आंदोलन में शामिल हुए, दूसरी जेल-यात्रा। 

1923 इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष बने। 

1927 ____ “अल-हिलाल” का पुनः प्रकाशन। 1

1929 मस्लिम नेशनलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष बने। 

1931 तीसरी जेल-यात्रा। 1 1932 चौथी जेल-यात्रा। 

1940 इंडियन नेशनल कांग्रेस के पुनः अध्यक्ष बने, रामगढ़ अधिवेशन का ऐतिहासिक अभिभाषण। 

1941 पाँचवी जेल-यात्रा 

1942 क्रिप्स मिशन का भारत में आगमन हुआ, कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते वार्ता में भाग लिया। 

1942 भारत छोडो आंदोलन के क्रम में अंतिम जेल-यात्रा। 

1943 पत्नी का कलकत्ता में निधन हुआ।

11946 कैबिनेट मिशन के साथ वार्तालाप। 

1946 शिमला कान्फ्रेंस में भाग लिया। 

1946 छह वर्षों (1940-46) की लंबी अवधि के पश्चात कांग्रेस अध्यक्ष का पद त्याग कर जवाहरलाल नेहरू को अध्यक्ष बनाने की अनुशंसा की। 

1946-1950 संविधान सभा की सदस्यता। 

1947 देश आजाद हुआ, शिक्षा मंत्री का पद ग्रहण किया। 

1948 विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का गठन। 

1949 राष्ट्रपति भवन संग्रहालय की स्थापना। 

1950 भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् (ICCR) की स्थापना। 

1951 कांग्रेस संसदीय दल के उप नेता बने। 

1951 खड़गपुर में Institute of Higher Technology की स्थापना। 

1952 देश में प्रथम आम चुनाव । मौलाना आज़ाद शिक्षा, प्राकृतिक संसाधन और विज्ञान अनुसंधान विभागों के मंत्री बने। 

1952 उच्च शिक्षा आयोग का गठन।

1953 विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना। संगीत नाटक अकादमी की स्थापना।

11954 साहित्य अकादेमी और ललित कला अकादमी की स्थापना। प्रथम काउन्सिल ऑफ स्पोर्ट्स का आयोजन। 

1956 पेरिस और लंदन की यात्रा। 

1956 दिल्ली में यूनेस्को कान्फ्रेंस का आयोजन । 

1958 मौलाना आजाद का निधन। 

1992 सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारतरत्न (मरणोपरांत) से सम्मानित किये गये।

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