आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 9

आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 9

आजाद से अबुल कलाम का सफर | Part – 9

मौलाना आजाद के कुछ महत्वपूर्ण भाषण

जामा मस्जिद का भाषण

(अक्तूबर, 1947)

प्रिय मित्रो! आप जानते हैं कि वह कौन-सी जंजीर है जो मुझे यहाँ ले आई है? मेरे लिए शाहजहाँ की इस यादगार मस्जिद में इस प्रकार आना कोई नई घटना नहीं है। मैंने उस समय में, जिसपर अब अनेक दिन और रात की घड़ियाँ बीत चुकी हैं, यहाँ से संबोधन किया था। तब तुम्हारे चेहरों पर परेशानी के स्थान पर संतोष था तथा तुम्हारे मन में शक के स्थान पर विश्वास था । और, आज जब मैं तुम्हारे चेहरों की परेशानी तथा दिलों की वीरानी देखता हूँ, तो मुझे अचानक पिछले वर्षों की भूली-बिसरी कहानियाँ याद आ जाती हैं। तुम्हें याद है, मैंने तुम्हें पुकारा और तुमने मेरी जुबाँ काट ली। मैंने कलम उठाया और तुमने मेरे हाथ काट दिए। मैंने चलना चाहा और तुमने मेरे पैर काट दिए। मैंने करवट लेनी चाही और तुमने मेरी कमर तोड़ दी, यहाँ तक कि गत् सात वर्षों की कड़वी राजनीति आज तुम्हें बिछड़ने का यह कलंक दे गई। उस समय जब इस राजनीति का बड़ा बोलबाला था, मैंने तुम लोगों को कठिनाइयों का अनुभव कराना चाहा, तब भी तुम लोगों को झंझोड़ना चाहा, परन्तु न केवल यह कि तुम पर मेरी आवाज़ का कोई प्रभाव नहीं हुआ, बल्कि तुम ने आलस्य तथा लापरवाही के सारे पूर्व उदाहरण याद दिला दिए। जिसका परिणाम यह हुआ कि आज तुम्हें उन कठिनाइयों ने घेर लिया है, जिनके संबंध में तुमने कभी सोचा नहीं था और तुम सीधे रास्ते से दूर हो गए। ____सच पूछो तो अब मैं शिथिल हूँ। एक ऐसी आवाज़ हूँ जो दूर जा चुकी है, जिसने देश में रहकर भी विदेशी का जीवन व्यतीत किया है। इसका अर्थ यह नहीं कि जो स्थान मैंने पहले दिन अपने लिए चुना था, वहाँ मेरे पंख काट दिए

गए हैं। अथवा मेरे ठिकाने के लिए कोई स्थान नहीं रहा। मैं तो यह कहना चाहता हूँ कि मेरे दामन को शिकायत है कि तुम्हारे हाथों ने उसे तार-तार कर दिया, मेरा एहसास घायल है तथा मेरा मन शोकमय है। सोचो तो सही, तुमने कौन-सा रास्ता अपनाया? कहाँ और क्या तुम्हारे होश-हवास अपने स्थान पर हैं? यह भय तुमने स्वयं ग्रहण किया है। यह तुम्हारे अपने कर्मों का फल है।

अभी अधिक समय नहीं बीता, जब मैंने तुमसे कहा था कि यह दो राष्ट्रों का विचार बड़ा भयकर है। इसको छोड़ दो। ये स्तंभ, जिन पर तुमने विश्वास किया है, बड़ी तेजी से टूट रहे हैं। परंतु तुमने सुनी-अनसुनी बराबर कर दी। और, यह नहीं सोचा कि समय तथा उसकी गति तुम्हारे लिए अपना चक्र नहीं बदल सकती। समय का चक्र रुका नहीं। तुम देख रहे हो कि जिन सहारों का तुम्हें विश्वास था, वे तुम्हें अनाथ बना कर भाग्य के हवाले करके चले गए हैं। इस भाग्य का अर्थ तुम्हारे मस्तिष्क के शब्द-कोश में परिश्रम से भिन्न है। तुम्हारी दृष्टि में परिश्रम की कमी का नाम भाग्य है। – अंग्रेजों का पासा तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध पलट दिया गया तथा पथ-प्रदर्शन के वे बुत जो तुमने बनाये थे, वे भी धोखा दे गए, जबकि तुमने सोचा था कि यह राज्य हमेशा के लिए आ गया है तथा इन्हीं बुतों की पूजा करना तुम्हारा जीवन है। मैं तुम्हारे घावों को कुरेदना नहीं चाहता तथा तुम्हारी परेशानी को और बढ़ाना मेरी इच्छा नहीं, परंतु यदि कुछ दूर अतीत की ओर लौट जाओ तो हमारे लिए बहुत-सी गुत्थियाँ खुल सकती हैं। एक समय था कि मैंने तुम्हें हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता प्राप्त करने के भाव से तुम्हें पुकारा था। तुम्हें पुकार कर मैंने कहा था

वाला है उसे कोई जाति अपनी अपशकुनी से रोक नहीं सकती। भारत के भाग्य में भी राजनीतिक इन्कलाब लिखा जा चुका है। यदि तुमने समय की गति के साथ मिल कर पग नहीं बढ़ाए तथा अपने इस वर्तमान आलस्य के जीवन को नहीं छोड़ा तो भविष्य में इतिहास लिखने वाला कहेगा कि तुम्हारे समुदाय में जो सात करोड़ मनुष्यों का एक समूह था, उसने देश को स्वतंत्र कराने के लिए वह राह अपनाई जो राह संसार के पृष्ठ से मिट जाने वाली जातियाँ अपनाती हैं। आज भारत स्वतंत्र है और तुम स्वयं अपनी आँखों से देख रहे हो कि वह सामने लाल किले की दीवार पर स्वतंत्र भारत का ध्वज पूरे गौरव से लहरा रहा है। यह वही ध्वज है जिसको फहराता देखकर घमंडी शासक निर्मम अट्टहास कर मजाक उड़ाते थे।”

यह ठीक है कि समय ने तुम्हारी इच्छानुसार अंगड़ाई नहीं ली, बल्कि इसने एक जाति के जन्मसिद्ध अधिकार के सम्मान में करवट बदली है और यही वह क्रांति है जिसकी एक करवट ने तुम्हें बहुत अधिक भयभीत कर दिया है। तुम सोंचते हो कि तुमसे कोई अच्छी वस्तु छीन ली गई तथा इसके स्थान पर तुम्हारे पास कोई बुरी वस्तु आ गई है। सच यह है कि बुरी दस्तु चली गई तथा अच्छी वस्तु आ गई। हाँ, तुम्हारी यह चिंता इस कारण है कि तुमने अपने आपको अच्छी वस्तु के लिए तैयार नहीं किया था, तथा बुरी वस्तु को ही सब कुछ समझ रखा था। मेरा तात्पर्य विदेशी दासता से है जिसके हाथों में तुम खिलौना बन कर जीवन व्यतीत करते रहे हो । एक दिन वह था, जब हमारा राष्ट्र किसी युद्ध को आरंभ करने की चिंता में था और आज तुम इस युद्ध के परिणाम से परेशान हो। मैं तुम्हारे स्वाभाव की इस जल्दबाजी को क्या कहूँ कि इधर अभी यात्रा की जिज्ञासा भी समाप्त नहीं हुई और उधर राह में भटक जाने का भय सामने आ गया।

_मेरे भाई, मैंने हमेशा ही राजनीति को व्यक्तित्व से अलग रखने की चेष्टा की है तथा मैंने कभी इन काँटों से भरी घाटी में कदम नहीं रखा। यही करण है कि मेरी अनेक बातें संकेतों का रूप धर लेती हैं। परंतु मुझे आज जो कुछ कहना है, वह मैं बिना किसी बंधन के कहना चाहता हूँ। संयुक्त भारत का बँटवारा मूल रूप से गलत था। धार्मिक विरोधों को जिस प्रकार हवा दी गई, इसके निश्चित परिणाम यही थे जो हमने अपनी आँखों से देखे और कुछ स्थानों पर तो दुर्भाग्यवश आज तक देख रहे हैं। ___ गत सात वर्षों की घटनाओं को दोहराने से कोई लाभ नहीं और न ही इससे कोई अच्छा परिणाम निकल सकता है। परंतु भारत में मुसलमानों पर जो कठिनाइयों का रेला आया है, वह निश्चित रूप से मुस्लिम लीग के गलत मार्गदर्शन का परिणाम है। परंतु मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं। मैं तो पहले दिन से ही इन परिणामों पर दृष्टि रखता था।

__ भारत की राजनीति की धारा बदल चुकी है। मुस्लिम लीग के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं है। अब यह हमारे अपने मस्तिष्क पर निर्भर है कि हम किसी अच्छी विचारधारा पर विचार भी कर सकते हैं या नहीं। इस विचार से मैंने नवंबर के द्वितीय सप्ताह में भारत के मुसलमान नेताओं को दिल्ली बुलाने का इरादा किया है। निमंत्रणपत्र भेज दिए गए हैं। निराशा का यह मौसम क्षणिक है। मैं

तुमको विश्वास दिलाता हूँ कि हमें खुद हमारे सिवाय कोई दबा नहीं सकता। ___ मैंने सदा कहा और आज फिर कहता हूँ कि विचलित होने का रास्ता छोड़ दो, भ्रम से हाथ उठा लो तथा कार्यहीनता को छोड़ दो। यह तीन धार की विचित्र कटार लोहे की उस दुधारी तलवार से अधिक कारगर है जिसके घाव की कथाएँ मैंने तुम्हारे युवाओं की जुबानी सुनी हैं।

___ यह पलायन का जीवन जो तुमने हिजरत के पवित्र नाम पर धरा है, इस पर विचार करो। तुम्हें प्रतीत होगा कि यह गलत है। अपने मन को दृढ़ बनाओ तथा मस्तिष्क को सोचने की आदत डालो और फिर देखो कि तुम्हारे ये निर्णय कितनी जल्दबाज़ी के हैं। आख़िर कहाँ जा रहे हो और क्यों जा रहे हो?

यह देखो-मस्जिद के मीनार तुमसे प्रश्न करते हैं कि तुमने अपने इतिहास के पन्नों को कहाँ गुम कर दिया है? अभी कल ही की बात है कि यहाँ जमुना के तट पर तुम्हारे काफिलों ने वजू किया था और तुम हो कि आज तुम्हें यहाँ रहते हुए भय लगता है, जब कि दिल्ली तुम्हारे खून से सींची हुई है। ___ प्रियजनो! अपने अंदर एक बुनियादी परिवर्तन उत्पन्न करो। जिस प्रकार कुछ समय पहले तुम्हारा उत्साह गलत था, ठीक उसी प्रकार यह आशंका और भय भी गलत है। मुसलमान तथा कायरता अथवा मुसलमान एवं उत्तेजना एक स्थान पर नहीं हो सकते। सच्चे मुसलमान को न तो किसी प्रकार की लालच हिला सकती है और न ही कोई भय डरा सकता है। कुछ लोगों के चेहरे आँख से ओझल होने से भयभीत मत होओ। उन्होंने तुम्हें जाने के लिए ही जमा किया था। आज उन्होंने तुम्हारे हाथ में से अपना हाथ खींच लिया है तो यह आश्चर्य की बात नहीं-यह देखो कि तुम्हारे मन तो इनके साथ विदा नहीं हो गए। यदि मन अभी तक तुम्हारे पास है तो उसमें उस खुदा का तेज भर दो जिसने आज से तेरह सौ वर्ष पूर्व अरब के एक उम्मी (जिसने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी) के माध्यम से कहा था…..

“जो अल्लाह पर ईमान लाए और उस पर कायम रहे तो उनके लिए न तो किसी प्रकार का भय है और न कोई दुख” | हवाएँ गुजर जाती हैं। यह हवा गर्म सही, परंतु इसकी अवधि कुछ अधिक नहीं। अभी देखते ही देखते पीड़ा की यह ऋतु गुज़र जाने वाली है। इस प्रकार बदल जाओ कि तुम कभी इस अवस्था में न थे। _ मुझे अपनी बात बार-बार दोहराने की आदत नहीं, परंतु तुम्हारी लापरवाही को देखकर बार-बार कहना पड़ता है कि तीसरी शक्ति अपने घमंड का बोरिया-बिस्तर बांध कर विदा हो चुकी है। जो होना था, वह होकर रहा है। राजनीति अपना पुराना ढांचा तोड़ चुकी है तथा अब नया सांचा ढल रहा है। यदि अब भी तुम्हारे मन नहीं बदले तथा तुम्हारे मस्तिष्क की चुभन समाप्त नहीं हुई तो

फिर बात दूसरी है। परन्तु यदि वास्तव में तुम्हारे अन्दर सच्चे परिवर्तन की इच्छा पैदा हो गई हो तो फिर इस प्रकार बदलो, जिस प्रकार इतिहास ने अपने आपको बदल लिया है। __आज हम क्रांति का एक काल पूरा कर चुके हैं। हमारे देश के इतिहास में कुछ पन्ने खाली हैं और हम इन पन्नों का शीर्षक बन सकते हैं। परन्तु शर्त यह है कि हम इसके लिए तैयार भी हों। ____मित्रो, परिवर्तनों के साथ चलो। यह न कहो कि हम इस परिवर्तन के लिए तैयार नहीं थे। बल्कि अब तैयार हो जाओ। सितारे टूट गए, परंतु सूर्य तो चमक रहा है। इससे किरणें माँग लो और उन अंधेरी राहों में बिछा दो जहाँ प्रकाश की बहुत आवश्यकता है। ___ मैं तुम्हें यह नहीं कहता कि तुम शासकों के दरबार से वफादारी का प्रमाणपत्र प्राप्त करो और भिक्षा-पात्र हाथ में लेकर उसी प्रकार का जीवन बिताओ, जैसा कि तुम विदेशी शासकों के काल में करते रहे हो। मैं कहता हूँ कि जो उजले चिह्न तुम्हें इस भारत में बीते हुए समय की यादगार के रूप में दिखाई दे रहे हैं, उन्हें तुम्हारा ही काफिला था। इन्हें भुलाओ नहीं, इन्हें छोड़ो नहीं, इन्हें अपनी पूंजी समझ कर रखो तथा समझ लो कि यदि तुम भागने के लिए तैयार नहीं हो तो फिर तुम्हें कोई शक्ति नहीं भगा सकती।

आओ, कसम खाओ कि यह देश हमारा है। हम इसी के लिए हैं तथा इसके भाग्य के निर्णय हमारे स्वर के बिना अधूरे ही रहेंगे। ____आज भूचालों से भयभीत हो । कभी तुम स्वयं एक भूचाल थे। आज अंधकार से काँपते हो, क्या याद नहीं रहा कि तुम्हारा अस्तित्व खुद एक उजाला था। यह बादलों ने मैला पानी बरसाया, और तुमने भीग जाने के डर से अपने पायंचे चढ़ा लिए हैं। वे तुम्हारे ही पूर्वज थे जो समुद्र में उतर गए। पर्वतों की छातियों को रौंद डाला। बिजलियाँ आई तो उन पर मुस्कराए, बादल गरजे तो कहकहों से उत्तर दिया। हवा के गर्म झोंके उठे तो उनकी दिशा को बदल दिया। आँधियाँ आईं तो उनसे कहा कि तुम्हारा रास्ता यह नहीं है। यह ईमान के दम टूटने की निशानी है कि सम्राटों के गिरेबानों से खेलने वाले आज खुद अपने ही गिरेबान को तार-तार कर रहे हैं तथा खुदा को इस तरह भुला चुके हैं जैसे उस पर कभी विश्वास ही नहीं था।” ___दोस्तो, मेरे पास तुम्हारे लिए कोई नया मंत्र नहीं है। चौदह सौ बरस पहले का मंत्र है। वह मंत्र जो संसार के सबसे बड़े कृपालु से मिला था। वह मंत्र कुरआन का यह संदेश है : “दुखी न हो और निराश न हो और तुम्हारे ही सर ऊँचे रहेंगे अगर तुम मोमिन हो’ ।

आज का साथ समाप्त हुआ-मुझे जो कुछ कहना था संक्षेप में कह चुका हूँ। फिर कहता हूँ, और बार-बार कहता हूँ : अपने हवास पर काबू रखो, अपने आस-पास जिन्दगी खुद प्राप्त करो। यह मंडी की चीज नहीं कि तुम्हें ख़रीद कर ला दूँ। यह तो दिल की दुकान में ही अपने अच्छे कर्मों के धन से मिल सकती है। । तुम पर अल्लाह की सलामती और रहमत और बरकत हो।

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