डॉक्टर संपूर्णानंद  :: व्यक्ति एवं सर्जन

डॉक्टर संपूर्णानंद  :: व्यक्ति एवं सर्जन

डॉक्टर संपूर्णानंद  :: व्यक्ति एवं सर्जन

19वीं सदी में प्रेस का विकास और विस्तार होने के कारण समाचार पत्रों एवं पत्रिका का उदय हुआ और उसके साथ ही लेखन के लिए  समसामयिक बोधक के साथ चिंतन में लेखन की आवश्यकता हुई |  अतः समय की आवश्यकता समझते हुए  विविध कार्यों और भूमिका मैं कार्य रत  लोगों ने निबंध लेखन के क्षेत्र में अपना परिचय दिया तो दूसरी ओर राजनीतिक सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्रों के आंतरिक आर्थिक धार्मिक मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में भी निबंध विधा की व्यापकता स्वत: काफी विस्तार पाई गई है | 

 

डॉ संपूर्णानंद का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी नगर में 1 जनवरी  1890 में एक समृद्ध  एवं प्रतिष्ठित कायस्त  परिवार में हुआ था |  अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि पूरी की प्रारंभ से ही लेखन में अभिरुचि थी लेखन  कविता से आरंभ किया था |

 

 प्रधानाध्यापक महात्मा गांधी  के आह्वान पर सत्याग्रह आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी की तथा प्रधानाध्यापक पद से त्याग किया | सन 1926 में प्रथम बार कांग्रेस की ओर से विधानसभा सदस्य बने  राजनीति में आने पर वे  मुलियाधारित  राजनीति बनकर ही सक्रिय हुए |  राष्ट्र की स्वतंत्रता के बाद वे  दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए | सन 1962 में राजस्थान के राज्यपाल पद पर आरूढ़  हुए 5 वर्षों तक इस गौरव का निर्वाह किया | 

 

 संपूर्णानंद चाहे विधानसभा सदस्य रहे हो या फिर प्रांतीय स्तर पर मुख्यमंत्री के पद पर अथवा राष्ट्रपति द्वारा सरकार की सहमति से राजस्थान के राज्यपाल के पद पर रहे हो, उनके भारतीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था  परीलक्षित होती थी | वह संस्कार संपन्न भारतीय परिवार के प्रतिनिधि थे | राज्यपाल पद पर आसीन रहते हुए सदैव वे  रामनवमी कृष्ण जन्माष्टमी शिवरात्रि के पूजन आयोजन राज भवन के प्रांगण में मनाया करते थे जिसमें प्रशासन एवं सार्वजनिक जीवन से जुड़े सभी प्रमुख व्यक्ति साहित्यकार और पत्रकार सम्मिलित होते थे | जीवन के आरंभिक काल में वे अच्छे पत्रकार थे | उन्होंने जागरण मर्यादा आदि का संपादन भी किया | 

 

 डॉ संपूर्णानंद का  सर्वाधिक  प्रिय विषय योग एवं दर्शन रहा है, और शिक्षा के भी विभिन्न क्षेत्रों पर उनके लेखन की सार्थक अभिव्यक्ति मिलती है |  वैसे तो यह कहा जा सकता है कि वे विभिन्न भाषाओं और विभिन्न विषयों के गंभीर विद्वान थे और राजनीति में भारतीय समाजवाद के समर्थक थे | इसलिए यह भी कहा गया है कि उनका बौद्धिक धरातल बहुत ऊंचा है, इसलिए गंभीर विषयों के अद्वितीय लेखक और चिंतक हैं | वेदांत से लेकर इतिहास विज्ञान आदि सभी को उनकी प्रतिभा ने समेट लिया है | 

 

डॉक्टर संपूर्णानंद भारतीय समाजवाद के पोषक होने के साथ ही सामाजिक समरसता पारस्परिक सौहार्द तथा सांस्कृतिक समाज की संरचना के पोषक एवं लेखक रहे हैं तथा नारी को सम्मान देते आए हैं | अपने अस्पष्ट चिंतन के स्तर पर उन्होंने लिखा भी है सत्य  सार्वदेशिक  है |   उसको भौगोलिक बंधन में नहीं बांधा जा सकता, सांस्कृतिक क्षेत्र को पक्षपात से  कलुषित न होने देना चाहिए | सत्य न  तो प्राची के हाथ का है,  न  प्रतिची के | उन्होंने दर्शन को  प्राचय  और पाश्चात्य नाम से दो वर्गों में बांटना भी भ्रामक और  कृतिम  बताया है |

 

 डॉ संपूर्णानंद ने उत्तराखंड के कुमाऊं प्रदेश के प्रमुख पर्यटक नगरी नैनीताल में वेधशाला स्थापित करने सासरे प्राप्त किया | यह कार्य उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री काल  में हुआ |  जब वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे तभी वेधशाला निर्माण आरंभ हुआ | राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी के निकटतम कार्यकर्ता और अखिल भारतीय कांग्रेस के विभिन् दायितवो के बीच तथा प्रशासनिक एवं राजनीतिक पदों पर सक्षम नेतृत्व की व्यवस्था के उपरांत भी हुए लेखन का समय निकाल दिया करते थे | उनके महत्वपूर्ण ग्रंथ समाजवाद अंतर्राष्ट्रीय दिखाओ ज्योति विनोद  धर्मवीर गांधी, सम्राट हर्षवर्धन, पृथ्वी के सप्त ऋषि मंडल, अंतरिक्ष यात्रा आदि हैं | पुस्तकों के विभिध  शीर्षक  से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वे  बहु विधात्मक  लेखन में सक्षम थे  |

 

आपके पाठ्यक्रम में सम्मिलित निबंध समाज और धर्म का संकलन उनके सुप्रसिद्ध निबंध संग्रह के चिद्वालास  में हुआ है | यहां निबंधकार संपूर्णानंद का समाजवादी चिंतन स्पष्ट परिलक्षित होता है |  आधुनिक समाज की संरचना का विश्लेषण करते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि जब तक व्यक्ति व्यक्ति में व्यक्ति और राष्ट्र में आपसी सम्मान और सौहार्द का भाव जागृत नहीं होता, तब तक राष्ट्रों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी रहेगी | विद्वान, कवि वैज्ञानिक आदि को किसी भी भौगोलिक सीमा में  बंधकर देखना संकुचित दृष्टि का परिचायक है | वस्तुतः उस समाज की ही आवश्यकता है जो मनुष्य को मनुष्य की भांति रहने का अवसर दें | 

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